मौन !!

 

मौन

मौन क्या है ? केवल चुप हो जाना ही मन नहीं होता। बल्कि मन और वाणी का शांत होना मौन है । मौन की अपनी अनुपम अभिव्यक्ति है । मौन की अपनी भाषा है। अपितु उनके तो कई रंग भी होते हैं। मन और वाणी दोनों से स्वयं को शांत कर लेना ही मौन है। किंतु यह करना अत्यंत ही कठिन होता है। जहाँ मन की गति अगाध है, असीमित है और अनियंत्रित भी है, वहां वाणी विराम थोड़ी देर मात्र के लिए ही सही कहा कोई दे पाता है? अर्थात मन और वाणी का संयम ही तो मौन है।


मौन में रहना स्वयं से परिचय का एक अच्छा अवसर होता है। कई बार हमारी चुप ही बड़े-बड़े मसले आसानी से हल कर देती है। यूँ ही नहीं कहा जाता कि मौन में बड़ी ताकत होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मौन रहने से हमारी शक्तियां संचित होती हैं। मौन से हमारा चित्त शुद्ध तथा शांत रहता है। यह हमें दया,क्षमा एवं अनुशासन सिखाता है तथा मौन से हमें आंतरिक शांति प्राप्त होती है। मौन से हमारी सारी इंद्रियां संयमित रहती हैं। चुप रहने से वाणी और वाणी के साथ खर्च होने वाली मस्तिष्क की जो ऊर्जा है वह संचित होती रहती है। ज्ञान-विज्ञान, धर्म-आध्यात्म, कला-संस्कृति आदि सभी विषयों से तारतम्य बनाने का सबसे सरल माध्यम मौन ही तो है। भारतीय संस्कति में भी मौन व्रत का विधान बताया गया है।  

मौन के दो प्रकार होते हैं। मुख के मौन को बाह्य और मन की मौन को अंर्तमौन कहा जाता है। बाह्य मौन का उपयोग करके हम कई झंझटों से बच सकते हैं। जितना आवश्यक हो उतना ही बोले, सोचकर बोले क्योंकि जितना सुखदायक मीठा बोलना होता है उससे कहीं अधिक लाभकारी होता है कम बोलना । आंतरिक सुख में रहना,आध्यात्मिक विचार करना,मन को इंद्रिय समूहों से हटाकर आत्म स्थिति में मगन रहना,मन को स्थिर कर बुरे विचार मन में ना लाना ही अंर्तमौन के मुख्य आधार हैं। क्योंकि मौन में आनंद है जो अव्यक्त है। शांत रहकर कार्य करना आपको कभी भी बेचैन नहीं करता। स्वयं से मिलने का जो रास्ता है उसका मुख्य द्वार मौन ही है। यानी आत्म साक्षात्कार मौन से ही संभव है। जो भूल गये वह जीवन था जो याद रह गया वह मौन है।


कुछ याद करना हो तो मौन है, किसी को याद करना हो तो मौन है, क्या याद रह जाएगा यह मौन बताएगा। हमारा प्रकृति के साथ तारतम्य मौन के समय ही बैठता है। तभी हम आसमान के नीले रंग, नदी के पानी का रंग और पेड़ों के हरे रंग को निहारते हैं, पहाड़ों से बातें करते हैं, प्रकृति बोलती है और हम सुनते हैं। कभी मौन का रंग सफेद होता है, कभी नीला, कभी लाल, कभी पीला तो कभी काला भी होता है। स्वामी विवेकानंद पर लिखी पुस्तक लाइफ ऑफ विवेकानंद एंड द यूनिवर्सल गास्पेल जो कि एक फ्रांसीसी लेखक रोमा रोला नें लिखी थी,कहते हैं कि विवेकानंद जी को हिमालय की पहाड़ियों के आसपास घूमना और रहना, दूर तक फैली बर्फ की सफेदी उनके मन में असीम ऊर्जा का संचार करती थी। जब भी वह देश और समाज की समस्याओं से परेशान रहते थे तो स्वयं में ऊर्जा भरने के लिए वह हल्द्वानी अल्मोड़ा की यात्रा करते थे। ऐसी जगहों पर वह स्वयं से बातें किया करते थे।  मौन का सफेद रंग उनके  अंतर्मन में हिलोरे लेते विचारों को शांति और शीतलता प्रदान करता था।


प्रकृति और मौन के बीच बड़ा ही सुंदर तालमेल होता है। जब हम प्रकृति के बीच मौन खड़े होते हैं तब हमारा औरों से संवाद टूट जाता है और हम सिर्फ प्रकृति की सुंदरता पर मुग्ध होते हैं। सफेद बर्फ के साथ नीला आकाश, सूर्य का पीला प्रकाश, दूधिया चांदनी, पेड़-पौधों की हरियाली तथा समुद्र के मटमैले रंग पर जब आपकी दृष्टि पड़ती है तो यह सारे रंग हमारे मन मस्तिष्क को झंकृत करते हैं। इसी तरह नीला आकाश हमें शांति देता है। यदि आप नीले आकाश को एकटक निहारें तो कुछ समय बाद एक गहन शांति आपके मन में उतर जाती है। यह अनुभूति आपके मन को शांत करती है। स्वयं ओशो अपनी पुस्तक समाधि के नृत्य गीत में कहते हैं कि नीला रंग आध्यात्मिक रंगों में से एक है। यह शांति का, मौन का रंग है......जब आप गहन शांति में होते हैं तो अचानक भीतर एक नीली ज्योति महसूस करने लगते हैं। नीली ज्योति का भाव आते ही दिमाग एकदम शांत हो जाता है ।


इसी प्रकार सूर्य के पीत प्रकाश के दर्शन करने पर हमारे मन में उत्साह का रंग फैल जाता है। चाणक्य ब्रह्म मुहूर्त में सूर्य से साक्षात्कार किया करते थे। कई राजा-महाराजाओं ने भी उनकी आराधना इसीलिए की है। क्योंकि सूर्य का पीत रंग उत्साह,संयम और सात्विकता बढ़ाता है,मन जागृत रहता है और हम सुकर्म करने के लिए प्रेरित होते हैं। मन में उठने वाले सकारात्मक विचार किसी भी व्यक्ति की क्षमता को दिशा प्रदान करते हैं। रविंद्र नाथ टैगोर ने भी व्यक्ति की सात्विकता और प्रकृति प्रेम पर बल दिया है। टैगोर कहते हैं विधाता ने हमें नगरों में ईंट एवं गारे के बीच जन्म लेने के उद्देश्य से नहीं बनाया, वृक्ष, पौधे, शुद्ध वायु, स्वच्छ तालाब आदि भी उतने ही आवश्यक हैं, जितना हमारे लिए हमारे रोजगार आदि।


प्रकृति तब और हरी भरी हो जाती है जब बसंत ऋतु आती है। तब चिड़िया भी कुछ क्षण चहचहाना और और कूकना छोड़ जगत की हरियाली को निहारने लगती है। यदि हम इस दृश्य को आत्मसात करेंगे तो जीवन का गूढ़दर्शन समझ में आ जायेगा। पेड़ों से पुराने पत्ते गिरने के बाद बसंत में नहीं कोपलें आना हमें बताता है कि जीवन किसी बिंदु पर ठहरता नहीं है, चलता रहता है। निरंतर यही निरंतरता सभी में उम्मीद जगाती है। टैगोर कहते हैं रंग में वह जादू है जो रंगने वाले, भीगनें वाले और देखने वाले तीनों के मन को विभोर कर देता है और इन रंगों से रूबरू होने के लिए हमें सबसे पहले मौन को साधना होगा।

रहीम जी ने कहा भी है एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए ।

डा.अलका दूबे

एम.ए.(हिन्दी), पी.एच.डी.-

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