हमनें पाली है ख़ुमारी इक बात के लिए तुम भी आ जाओ बन के क़ायनात इक रात के लिए जंग लड़ती हूँ मै खुद से तुम्हारे लिए हाँ नहीं तो ना भी मत करना, मेरी ज़ात के लिए मैं इरादा अपना बदलूँ कैसे, मेरे सामनें तुम हो कोई और होता तो मैं सोचती भी, नहीं सोच सकती इस बात के लिए मुकम्मल करके मोहब्बत अपनी, मैं तुम्हे खोना नहीं चाहती तुमको रखा है मैंनें ज़िन्दगी में अपनी, इबादात के लिए रूह में तेरी बस कर सदियाँ निभा जानी हैं हमको उतर जाओ मुझ में मेरे बन कर, मेरे इस जज़्बात के लिए सब कहते हैं मुझ से मगर तुम क्यूँ नहीं कहते गुज़र रहा है वक़्त आ जाओ इक़ बार मुलाक़ात के लिए
बहुत कुछ जोड़ सकता है किसी को किसी से...... धूप भी, बारिश भी हवायें भी, आसमान भी सूरज का ढलना और उगना पहाड़ों पर संग टहलना भी . . . सूरज का आना बिस्तर पे कमरे में चमकना चाँद का उड़ाना सिगरेट के छल्ले संग और बीयर की दूकान भी बहुत कुछ जोड़ सकता है किसी को किसी से....... एक ही थाली में खिलाना-खाना नींबू का अचार,गोभी के पराठे और बनारसी पान भी मांझे से लगी ऊँची उड़ती पतंग वो छत वाला मकान भी बहुत कुछ जोड़ सकता है किसी को किसी से....... देवी का मंदिर अरदास गुरूद्वारे की चर्च की बेल और मस्जिद की अजान भी . . . गीत भी, गज़ल भी सुर भी, तान भी मीर के शेर और ग़ालिब का दीवान भी बहुत कुछ जोड़ सकता है किसी को किसी से...... प्रेम करना भी और प्रेम जताना भी !!
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