..... बहुत दूर निकल आये हैं हम अपने गांव से । अब तो हम बड़े आदमी हो गये हैं । शहर में हमारा एक मकान भी है. .... बड़ा सा । लेकिन अनाज खरीद कर खाते हैं ।
हमनें पाली है ख़ुमारी इक बात के लिए तुम भी आ जाओ बन के क़ायनात इक रात के लिए जंग लड़ती हूँ मै खुद से तुम्हारे लिए हाँ नहीं तो ना भी मत करना, मेरी ज़ात के लिए मैं इरादा अपना बदलूँ कैसे, मेरे सामनें तुम हो कोई और होता तो मैं सोचती भी, नहीं सोच सकती इस बात के लिए मुकम्मल करके मोहब्बत अपनी, मैं तुम्हे खोना नहीं चाहती तुमको रखा है मैंनें ज़िन्दगी में अपनी, इबादात के लिए रूह में तेरी बस कर सदियाँ निभा जानी हैं हमको उतर जाओ मुझ में मेरे बन कर, मेरे इस जज़्बात के लिए सब कहते हैं मुझ से मगर तुम क्यूँ नहीं कहते गुज़र रहा है वक़्त आ जाओ इक़ बार मुलाक़ात के लिए
उसे याद बहुत किया और उसकी याद भी बहुत आयी याद आया वो बाद में पहले उसकी याद आयी ठहरी सी उसे सोचती आँखें, चुप सा दिल, उसकी सांसें जैसे तसव्वुर उसका ही और उसकी ही तन्हाई.....
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