..... बहुत दूर निकल आये हैं हम अपने गांव से । अब तो हम बड़े आदमी हो गये हैं । शहर में हमारा एक मकान भी है. .... बड़ा सा । लेकिन अनाज खरीद कर खाते हैं ।
कबीर और तुलसी के राम भारतीय संस्कृति में राम एक चिर परिचित नाम है। राम की परिकल्पना हर युग हर भाषा के कवि ने अपनी-अपनी शैली में की है। भक्तिकाल के कवियों में कबीर दास एवं तुलसीदास दोनों ने ही अपने भावों की अभिव्यक्ति राम के माध्यम से की है। कबीर दास जी ने यह चित्रण आंशिक रूप में किया है जबकि तुलसीदास जी का समग्र साहित्य राम को ही समर्पित है। इन दोनों ही संत कवियों के कार्य में राम का वर्णन होते हुए भी दोनों के राम का स्वरूप भिन्न-भिन्न है। कबीर के राम निर्गुण ब्रह्म है। उनके राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम से अलग है। कबीरदास जी कहते हैः- दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना । राम नाम को मरम है आना ।। कबीर निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक हैं और उन्होंने उसका नाम राम रखा। अर्थात उन्होंने अपनी भक्ति भावना को प्राप्त करने के लिए राम को आलंबन बनाया था। कबीर अपने को सेवक और राम को सेव्य मानते हुए कहते हैः- कबीर कुता राम का मुतिया मेरा नाऊँ। गलै राम की जेवड़ी , जित खैंचे तित जाऊँ॥ वस्तुतः कबीर के राम बौद्दौ के शून्य ब्रह्म के प्रतिर...
हमनें पाली है ख़ुमारी इक बात के लिए तुम भी आ जाओ बन के क़ायनात इक रात के लिए जंग लड़ती हूँ मै खुद से तुम्हारे लिए हाँ नहीं तो ना भी मत करना, मेरी ज़ात के लिए मैं इरादा अपना बदलूँ कैसे, मेरे सामनें तुम हो कोई और होता तो मैं सोचती भी, नहीं सोच सकती इस बात के लिए मुकम्मल करके मोहब्बत अपनी, मैं तुम्हे खोना नहीं चाहती तुमको रखा है मैंनें ज़िन्दगी में अपनी, इबादात के लिए रूह में तेरी बस कर सदियाँ निभा जानी हैं हमको उतर जाओ मुझ में मेरे बन कर, मेरे इस जज़्बात के लिए सब कहते हैं मुझ से मगर तुम क्यूँ नहीं कहते गुज़र रहा है वक़्त आ जाओ इक़ बार मुलाक़ात के लिए
Comments
Post a Comment