साथ मेरे चल पाओगे क्या ?

मुसलसल यूँ ही याद आओगे क्या ?
इस बार भी वैसे ही सताओगे क्या ?

हमारे तुम हो और हम तुम्हारे हैं जब 
फिर भी रस्में दुनियादारी निभाओगे क्या ?

गुजरा है जो एक अरसा 
तुम्हारे जाने और आने के बीच में 
आओ बैठो पास मेरे 
लम्हें वो संग फिर नहीं बिताओगे क्या ?

हम चुप से नाम पर तुम्हारे कायम हैं 
आज भी इस जहान में 
सोचते हो क्या तुम 
जहान को नाम मेरा बताओगे क्या ?

जो थे हम संग तुम्हारे कभी 
अब तो बिल्कुल भी वैसे नहीं हैं 
यह बदले-बदले से जो हैं हम 
साथ मेरे चल पाओगे क्या ?

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